इंदौर म्यूजिक फेस्टिवल में पधारीं ख्यात गायिका श्रीमती मालिनी से बातचीत
विदुषी मालिनी अवस्थी भारतीय लोकसंगीत की उन अग्रणी स्वर-साधिकाओं में से हैं जिन्होंने लोक परम्परा को मंच, मीडिया और नई पीढ़ी तक सम्मानपूर्वक पहुँचाया। उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरती से निकली मालिनी जी ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा विदुषी गिरिजा देवी से प्राप्त की, पर अपनी असली पहचान लोकधुनों-अवधी, भोजपुरी, बुंदेली और पूर्वांचली गीतों को स्वर देने से बनाई। उनके गायन में लोक की मिट्टी की गंध, स्त्री अनुभव की करुणा, उत्सव की लय और जीवन की सहजता एक साथ सुनाई देती है।
विवाह, जन्म, ऋतु, पर्व और श्रम से जुड़े गीतों को वे मंच पर ऐसे प्रस्तुत करती हैं कि वे सांस्कृतिक संवाद बन जाते हैं।
इन्दौर में विगत दिनों सम्पन्न हुए पं गौतम काले जी के संगीत गुरुकुल के इंदौर म्यूजिक फेस्टिवल के 11 वें संस्करण में कन्नौज,लखनऊ,बनारस की विशिष्टता लिए, गिरिजा देवी की शिष्या विदुषी मालिनी अवस्थी
ने राग मिश्र खमाज में बंदिश “ठाड़े रहो बाँके श्याम” से शुरुआत की इसके पश्चात “सांवरिया रे नाही सहूँगी तोरी बात” सुनाई, फिर दादरा- “बलम तोरे झगड़े में रैन गई।”
फिर “सइयाँ जुलूम करे…वो तो काहू से नाहीं डरे”इसके पश्चात चैती-“अरे सुगना बोले लाss हमरी अटरिया पे हाय”
इसके पश्चात ठुमरी-“रात हम देखली सपनवा हो रामा,पिया घर आइवे”
फिर सुमधुर चैती- “बैरन रे कोयलिया तोहरी बोली ना सुहाय” से समापन किया।
इसके बाद उन्होंने “रंगी सारी गुलाबी चुनरिया रे” सुनाया
अंत में श्रोताओं के अनुरोध पर उन्होंने भैरवी में – “बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए” से समापन किया जिसे सुनकर कई आँखें नम हो उठीं। संगीत मार्तंड पद्मविभूषण पण्डित जसराज जी को समर्पित इन्दौर म्युजिक फेस्टिवल में मालिनी जी को सुनना एक अविस्मरणीय अनुभव था।
उनसे कुछ बतकही का सौभाग्य भी हासिल हुआ। ठुमरी को लेकर वे कहती हैं कि उस समय जब इन ठुमरियों की रचना हुई होगी तब स्त्रियों ने प्रेम में जो विरह महसूस की होगी, वही शब्दों और भावों में काव्य के रूप में व्यक्त किया होगा।
अपने चुटीले अंदाज़ में उन्होंने कहा-“ठुमरी के लिए इश्क़ करना भी ज़रूरी है और धोखा खाना भी!”
मुझे उन्होंने कहा-“जो मन की पुकार हो, उसको सुर में गाइए और अच्छे से करिए आप अवश्य सफ़ल होंगी।”
जब मैंने उनसे पूछा कि शास्त्रीय से लोक संगीत की तरफ कैसे रुझान हुआ तो उन्होंने जवाब दिया कि “मेरे लिए संगीत की विधाओं में कोई भेद नहीं है और ये जो भेद करते हैं उसी के ख़िलाफ़ मेरी जंग भी रही है।”
“६०-७० के दशक में एक दौर आया जिसने संगीत को टुकड़ों में बांट दिया।शास्त्रीय,उप शास्त्रीय और सुगम,ग़ज़ल और लोक आदि।”
“पहले के सिंगर्स को देखिए, जितनी पुरानी रिकॉर्डिंग आप उठा कर सुन लीजिए चाहे अप्पा जी (गिरिजा देवी) हों या रसूलन बाई हों,उन्होंने लोक भी उतने अच्छे से निभाया है और शास्त्रीय भी! यही हमारे गायन का आधार हैं।”
मेरे लिए सबसे अहम सवाल जो मैंने उनसे किया वह था -“मुझे किसी ने कहा कि तुमको मालिनी अवस्थी बनना है? तो इसका जवाब क्या देना चाहिए?”
तो बोलीं कैसे देना है प्यार से या क्रोध से? इसका जवाब अपने काम से दो और कहो हाँ बनना है।”
इसका जवाब तुम्हें खुद ही ढूँढना होगा।कई अड़चनें आयेंगी लेकिन पार पाना होगा।
मालिनी अवस्थी जी का मानना है कि लोकसंगीत हमारी सामूहिक विरासत है, जिसे अगली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाना कलाकार का दायित्व है। इसी सोच के साथ उन्होंने लोकगीतों के संकलन और व्याख्या पर भी काम किया, ताकि जो परम्परा अब तक श्रुति और स्मृति में थी, वह लिखित रूप में भी सुरक्षित रहे।
उल्लेखनीय है कि हाल में ही प्रकाशित
उनकी किताब “चंदन किवाड़” लोक की खुशबू और संस्कृति की झलक दोनों को समेटे हुए है।
भारतीय संगीत और लोक संस्कृति को जीवंत करने वाली सिद्ध गायिका आदरणीय मालिनी अवस्थी जी को उनके जन्मदिवस पर बधाई और प्रणाम।
-एकता कश्मीरे















