पृथ्वी गंधर्व और बोस्टन की वह यादगार शाम 

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जन्मदिवस विशेष: अप्रैल में कई प्रसिद्ध भारतीय कलाकारों का जन्म हुआ है।उनमें से एक हैं- पृथ्वी गंधर्व 

एंडोवर के कॉलिन्स सेंटर फॉर परफार्मिंग आर्ट्स में उस दिन बेहद गहमा गहमी थी।दर्शकों की तादाद बढ़ती जा रही थी।

ऑडिटोरियम खचाखच भर चुका था यहाँ तक कि कुछ लोगों को खड़े होकर भी कार्यक्रम देखना पड़ा।

शो था- “ग़ुलाम अली लाइव इन बॉस्टन” साथ में “पृथ्वी गंधर्व शो” जिसके आयोजक थे- जय हो शो के मिस्टर जय कुमार 

पृथ्वी गंधर्व की सुमधुर ग़ज़लों से इस कार्यक्रम की शुरुआत हुई और कुछ ग़ज़लों के साथ उन्होंने खूबसूरत स्वरचित एक्स्ट्रा अंतरे (शेर) भी गाए।

प्रस्तुति का अंदाज़, और आवाज़ दोनों ही इतनी प्रभावी थी कि श्रोता आनंद से सराबोर हो गए।

ग़ुलाम अली साहब के साथ, वह भी ग़ज़ल विधा में मंच साझा करना- निस्संदेह गौरव का क्षण था।पहाड़ की मौजूदगी में पृथ्वी की परवाज़ ने विदेशी धरती पर श्रोताओं के दिलों में अपनी गूंज दर्ज कर दी।

मैं बात कर रही हूँ भारतीय संगीत जगत के उभरते युवा और बहुमुखी कलाकार पृथ्वी गंधर्व की ,जो एक प्रतिभाशाली गायक, संगीतकार और मंचीय प्रस्तोता हैं, जो शास्त्रीय संगीत, ग़ज़ल, सूफी और बॉलीवुड प्लेबैक गायन में अपनी विशेष पहचान रखते हैं। पृथ्वी ने अपनी गहराई भरी आवाज़ और रचनात्मकता से देश विदेश के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है।

उनका जन्म एक संगीतमय वातावरण में हुआ, जहाँ उनके दादा मोहन सिंह एक प्रसिद्ध हारमोनियम वादक थे और उनके पिता अशोक गंधर्व एक कुशल वायलिन वादक हैं। बहन भी सिंगर है और परिवार में बचपन से ही संगीत का माहौल मिला। इसके साथ ही उन्होंने वायलिन, पियानो और सितार जैसे वाद्यों में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसने उनकी संगीत रचना की क्षमता को और समृद्ध किया।

पद्मश्री हरिहरन जी के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी गायकी को और निखारा। उर्दू कविता और ग़ज़लों के प्रति उनका लगाव शुरू से ही स्पष्ट रहा है, जो उनकी प्रस्तुतियों में भावनात्मक गहराई के रूप में झलकता है।

अपने करियर में पृथ्वी ने बॉलीवुड में फिल्म बाजीराव मस्तानी के‘अलबेला सजन’ और बंदिश बैंडिट के ‘निर्मोहिया’ सहित कई प्रोजेक्ट्स में अपनी आवाज़ और संगीत का योगदान दिया। उन्होंने ‘मायोहो’ फिल्म से प्लेबैक की शुरुआत की और ‘Journey of Bhangover’ तथा अन्ना हजारे की बायोपिक के लिए संगीत रचना भी की। अपने बैंड के साथ वे विश्वभर में आठ सौ से अधिक कॉन्सर्ट कर चुके हैं और श्रेया घोषाल,ऋचा शर्मा , उस्ताद ज़ाकिर हुसैन और शिवमणि जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ मंच साझा कर चुके हैं।

 पृथ्वी का जुड़ाव ईशा फाउंडेशन के साथ भी रहा है, जहाँ वे सद्गुरु के कार्यक्रमों में नियमित रूप से प्रस्तुति देते हैं। उस्ताद राशिद खान के साथ उनका एल्बम “जज़्बा ” काफी सराहा गया और GIMA अवॉर्ड्स के लिए नामांकित भी हुआ।

उनकी प्रमुख प्रस्तुतियों में ‘आज रंग है’, ‘मेरे प्रभु’, ‘अब छलकते हुए’ (भूमि 2025), और ‘शिव शिव शिव शंभो’ जैसे गीत शामिल हैं। उन्होंने लाहौर के विरासत हेरिटेज में ग़ज़ल प्रस्तुत कर जगजीत सिंग और मेहदी हसन जैसे महान कलाकारों को श्रद्धांजलि भी दी है। ‘जोगी दे नाल’ और ‘ईशा इबादत’ जैसे उनके स्वतंत्र ट्रैक सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय हुए हैं।

पृथ्वी गंधर्व का मानना है कि हर संगीत,चाहे वह फिल्मी हो या ग़ज़ल,उसकी जड़ें शास्त्रीय संगीत में ही निहित होती हैं। यही मजबूत शास्त्रीय आधार उनकी गायकी को विशिष्ट बनाता है और हर प्रस्तुति में एक अलग ही आत्मीयता और प्रभाव पैदा करता है।साथ ही अपने प्रशंसकों के साथ आत्मीय व्यवहार, उनके व्यक्तित्व की पहचान है।

पृथ्वी जी का लिखा एक शेर –

वो इंसान ही क्या, जो ज़िंदगी में कभी बदला ही नहीं…

वो वक़्त ही क्या, जिसपे मैं कभी संभला ही नहीं…

ये तेरे जुनून की बात है, तो करके दिखा,

बदला लेने से तेरे किरदार में कुछ बदला ही नहीं…

ग़म जब भी आते हैं, तो हर तरफ़ से आते हैं,

और अगर एक ही मसला है, तो कोई मसला ही नहीं…

-पृथ्वी गंधर्व 

जन्मदिन शुभ हो,आप उत्तरोत्तर प्रगति करें।

-एकता कश्मीरे