मोहम्मद अमान : विरासत से मिली सुर-साधना, मेहनत से बनी पहचान

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भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो न केवल अपनी गायकी से,बल्कि अपनी साधना, परंपरा और समर्पण से भी पहचान बनाते हैं। ऐसे ही युवा कलाकार हैं श्री मोहम्मद अमान ख़ान,जिनकी संगीत यात्रा विरासत में मिले सुरों से शुरू होकर देश के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुँची है।

2 जून 1992 को राजस्थान के टोंक में जन्मे मो. अमान ख़ान को संगीत विरासत में मिला। उनके परिवार में पीढ़ियों से गायन और तबला वादन की समृद्ध परंपरा रही है। मात्र पाँच वर्ष की आयु से उन्होंने अपने दादा उस्ताद अमीर मोहम्मद ख़ान और पिता उस्ताद ज़फ़र मोहम्मद ख़ान के सान्निध्य में संगीत की शिक्षा आरम्भ की।

उनके दादा उस्ताद अमीर मोहम्मद ख़ान साहब ने तबले की शिक्षा अपने पिता उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद ख़ान तथा उस्ताद हफ़ीज़ ख़ान से प्राप्त की थी। वहीं गायन की तालीम उन्हें बाकर हुसैन ख़ान और उस्ताद अब्दुल कादर ख़ान से मिली। यही कारण है कि मो. अमान सर की गायकी में आगरा और पटियाला घरानों की विशिष्ट छाप स्पष्ट दिखाई देती है।

मो.अमान ने मात्र छह वर्ष की आयु में जयपुर के सिंजारा महोत्सव में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उस छोटी-सी शुरुआत ने आगे चलकर एक लंबे और सफल संगीत सफर का रूप ले लिया। मंच दर मंच, शहर दर शहर, उनकी गायकी श्रोताओं के दिलों तक पहुँचती गई।

उनकी संगीत यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 2012 में आया, जब उन्होंने zee Tv Sa Re Ga Ma Pa में भाग लिया। इस मंच पर उन्होंने लगभग 35 एपिसोड तक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत किया। उस समय निर्णायक मंडल में शंकर महादेवन , साजिद ख़ान , वाजिद ख़ान और राहुल राम जैसे नाम शामिल थे।
इस दौरान अनेक महान कलाकारों और फिल्मी हस्तियों ने उनके गायन को सराहा। इनमें पंडित जसराज, ग़ुलाम अली, बेगम परवीन सुल्ताना, पंडित विश्वमोहन भट्ट, विशाल भारद्वाज तथा रेखा भारद्वाज जैसे नाम शामिल रहे।
उस समय राष्ट्रीय मंच पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को केंद्र में रखकर अंतिम चरणों तक पहुँचना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। अमान सर ने न केवल प्रतियोगिता में अपनी पहचान बनाई, बल्कि युवा पीढ़ी के सामने शास्त्रीय संगीत की गरिमा को भी मजबूती से प्रस्तुत किया।

इसके बाद उनकी प्रस्तुतियाँ देश के अनेक प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में होती रहीं। उन्होंने तानसेन समारोह, बाबा हरिवल्लभ संगीत समारोह, पश्चिम बंगाल राज्य संगीत अकादमी, सबरंग फेस्टिवल सहित देश के अनेक महत्वपूर्ण आयोजनों में अपनी कला का प्रदर्शन किया। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, बेंगलुरु, भोपाल, उज्जैन और ऋषिकेश जैसे शहरों में उनकी प्रस्तुतियों को श्रोताओं ने खूब सराहा।

हाल के वर्षों में मोहम्मद अमान ख़ान ने लोकप्रिय वेब सीरीज़ बंदिश बैंडिट्स के चर्चित गीत “गरज गरज” की जुगलबंदी में भी अपनी स्वर-प्रतिभा का योगदान दिया। इस प्रस्तुति में उन्होंने “राधे” वाला हिस्सा गाया, जिसे श्रोताओं ने विशेष रूप से सराहा। शास्त्रीय संगीत की गहराई और युवा ऊर्जा का यह संगम उनके गायन की बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है। यह उपलब्धि बताती है कि अमान न केवल पारंपरिक मंचों पर बल्कि समकालीन संगीत परियोजनाओं में भी अपनी विशिष्ट पहचान बना रहे हैं।

हाल ही में उन्होंने मुंबई के St. Xavier’s College में आयोजित जेनफेस्ट में भी प्रस्तुति दी। देश के विभिन्न शहरों में उनके कार्यक्रम लगातार जारी हैं और वे युवाओं तक शास्त्रीय संगीत की परंपरा पहुँचाने का कार्य कर रहे हैं।
कुछ वर्ष पूर्व हमें बहुत अल्प समय के लिए उनसे ऑनलाइन सीखने का अवसर प्राप्त हुआ था।
लेकिन उनकी गायकी को सामने बैठकर सुनने और उनके व्यक्तित्व को करीब से जानने का अवसर तब मिला जब उनका कार्यक्रम भारत भवन, भोपाल में आयोजित हुआ था। उस अवसर पर उन्होंने हमें भी स्नेहपूर्वक आमंत्रित किया था।

इसके बाद इंदौर में उनके एक कार्यक्रम के दौरान हमारे घर उनके आतिथ्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने परिवार के साथ आत्मीय माहौल में शाकाहारी भोजन किया और फिर एक छोटी-सी संगीत बैठक सजी, जिसमें कुछ संगीत प्रेमी मित्र और परिचित भी शामिल हुए। हमारी मम्मीजी के अनुरोध पर उन्होंने राग यमन कल्याण की एक बंदिश “दरसन देवो शंकर..महादेव” भी सुनाई, जिसे सुन,सभी अभिभूत हो उठे।उस बैठक में अमान सर को इतने निकट से सुनना एक अविस्मरणीय अनुभव रहा।

सबसे विशेष बात यह कि उनमें ज़रा भी अहंकार नहीं है। वे बेहद सरल, विनम्र और ज़मीन से जुड़े हुए इंसान हैं।
मोहम्मद अमान ख़ान की यात्रा यह बताती है कि जब विरासत, साधना और निरंतर अभ्यास एक साथ मिलते हैं, तो संगीत आपकी पहचान बन जाता है। आज अमान सर उसी पहचान को अपने सुरों के माध्यम से आगे बढ़ा रहे हैं-एक ऐसे कलाकार के रूप में, जो परंपरा का सम्मान करते हुए भविष्य की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने यह साबित किया कि शास्त्रीय संगीत की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, उसकी पहुँच उतनी ही व्यापक हो सकती है।
— एकता कश्मीरे