मोहन वीणा का विश्वनाद: पंडित विश्व मोहन भट्ट

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आज से तीन वर्ष पूर्व मैंने शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए पं गौतम काले के संगीत गुरुकुल में प्रवेश लिया था।मेरा पहला ही दिन था और किन्हीं वरिष्ठ कलाकार की वर्कशॉप होने वाली थी। हम सब कक्षा में बैठे ही थे कि अचानक गुरुजी के साथ गेरुए वस्त्रों में एक संत समान तेजस्वी व्यक्तित्व का आगमन हुआ जिनके सम्मान में हाथ स्वतः ही जुड़ गए।
गुरुजी ने परिचय दिया-“आज हमारे बीच ग्रैमी अवार्ड विनर पद्म भूषण पंडित विश्वमोहन भट्ट जी उपस्थित हैं,जिन्होंने मोहन वीणा का आविष्कार किया है।”
यह नाम मेरे लिए अपरिचित नहीं था।उनके साक्षात्कार सुने थे और संगीत-जगत में उनके अप्रतिम योगदान के बारे में पढ़ा था। किंतु उस दिन उन्हें अपने सामने साक्षात् देखकर लगा मानो किसी साधक, किसी ऋषि का सान्निध्य प्राप्त हो गया हो

कार्यशाला के दौरान उन्होंने जितना संगीत के बारे में कहा, उससे कहीं अधिक अपने व्यक्तित्व से सिखाया। विश्व के सर्वोच्च सम्मानों में से एक ग्रैमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले कलाकार के भीतर उपलब्धियों का लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। उनकी विनम्रता, सहजता और सरल व्यवहार ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की विराट परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण नहीं, बल्कि अपनी मौलिक सृजनशीलता के कारण इतिहास में दर्ज होते हैं। पद्म भूषण एवं ग्रैमी पुरस्कार से सम्मानित पंडित विश्व मोहन भट्ट ऐसे ही व्यक्तित्व हैं,जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक नया वाद्य, नई भाषा और नई वैश्विक पहचान दी। उन्होंने पश्चिमी हवाईयन गिटार को भारतीय रागदारी संगीत की आत्मा से जोड़कर ‘मोहन वीणा’ का निर्माण किया और यह सिद्ध कर दिया कि परंपरा निरंतर विकसित होती रहती है।

जयपुर के प्रतिष्ठित संगीत परिवार में जन्मे पंडित विश्व मोहन भट्ट ने प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता पंडित मनमोहन भट्ट से प्राप्त की। आगे चलकर वे पंडित रविशंकर की परंपरा से जुड़े और मैहर घराने की गायकी तथा तंत्रकारी शैली को आत्मसात किया। यही कारण है कि उनके वादन में स्वर की कोमलता और तानों की तेजस्विता समान रूप से दिखाई देती है।
साठ और सत्तर के दशक में जब पश्चिमी गिटार युवाओं को आकर्षित कर रहा था, तब विश्व मोहन भट्ट ने उसी वाद्य को भारतीय शास्त्रीय संगीत के अनुरूप ढालने का साहस किया। उन्होंने एक ऐसा वाद्य विकसित किया जिसमें सितार, सरोद और वीणा की विशेषताओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यही वाद्य आगे चलकर मोहन वीणा के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ।

उनका वादन केवल तकनीकी कौशल के साथ साथ गायकी और तंत्रकारी का ऐसा समन्वय है, जिसमें हर मींड, हर गमक और हर स्वर श्रोता के भीतर उतरता चला जाता है।

वर्ष 1994 भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय बन गया। अमेरिकी कलाकार Ry Cooder के साथ उनका एल्बम “A Meeting by the River” विश्व के सर्वोच्च संगीत सम्मान ग्रैमी अवार्ड से सम्मानित हुआ। यह न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि थी, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की वैश्विक प्रतिष्ठा का उत्सव था।

इसके बाद उन्होंने विश्व के अनेक प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और भारतीय रागों की मधुरता को अस्सी से अधिक देशों तक पहुँचाया।

पंडित विश्व मोहन भट्ट को पद्मश्री, पद्म भूषण, संगीत नाटक अकादमी सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। किंतु उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाया। उनके वादन में परंपरा की गंभीरता भी है और प्रयोग की स्वतंत्रता भी।



आज उनके पुत्र पंडित सलिल विश्व मोहन भट्ट ‘सात्विक वीणा’ के माध्यम से इस परंपरा को नई दिशा दे रहे हैं। पिता और पुत्र की यह जोड़ी भारतीय संगीत की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जहाँ विरासत को भी साधना से अर्जित किया जाता है। हाल ही में दोनों को एक साथ ‘अमृत-रत्न अवार्ड’ से सम्मानित किया जाना इस परंपरा की निरंतरता का सुंदर प्रमाण है।

अब बात करते हैं, पंडित जी के जीवन के ऐसे अध्याय के बारे में,जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत और राजस्थान की लोक-संवेदना को विश्व मंच पर एक साथ प्रतिष्ठित किया,वह है ‘Desert Slide’।

मोहन वीणा की सुरलहरियों, मांगणियार गायकी, सारंगी, तबला और खड़ताल के साथ प्रस्तुत यह कार्यक्रम थार के मरुस्थल की आत्मा को स्वर देता है। यह संगीत प्रस्तुति भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव प्रतीत होती है।

पंडित विश्व मोहन भट्ट भारतीय सांगीतिक संस्कृति के ऐसे दूत हैं जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु निर्मित किया। उनकी साधना आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है और यह विश्वास भी कि जब कला तपस्या बन जाती है, तब उसका स्वर पूरी दुनिया सुनती है।

ऐसा ही एक अविस्मरणीय क्षण तब आया, जब वरिष्ठ कला एवं
संस्कृतिकर्मी श्री संजय पटेल ने मेरा परिचय उनसे एक लोकगायिका के रूप में कराया। यह सुनकर उनके चेहरे पर स्नेहिल मुस्कान खिल उठी। उन्होंने आत्मीयता से मेरा उत्साहवर्धन किया, स्नेहपूर्वक आशीर्वाद दिया और लोकसंगीत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करते रहने की प्रेरणा दी। एक विश्वविख्यात कलाकार से प्राप्त यह आशीर्वाद मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं, बल्कि मेरी संगीत-यात्रा की अमूल्य धरोहर है।
आप स्वस्थ रहें और आपका संगीत सदैव गूंजता रहे जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएँ 🙏